संधि किसे कहते हैं? संधि के परिभाषा, भेद,प्रकार ,उदाहरण और प्रयोग

दोस्तो आज topperhub.com सेे जानेंगे कि संधि किसे कहते है?,संधि की परिभाषा क्या होता है?, संधि केे कितने प्रकार होते है। संधि कौन-कौन से होते हैं। और इसके साथ यह भी जानेंगे कि (स्वर संधि, दीर्घ संधि, गुण संधि, वृद्धि संधि और यण संधि,) क्या होते हैं। इसके साथ ही व्यंजन और विर्सग संधि के बारे में चर्चा करेंगे|

संधि शब्द का साबित अर्थ क्या है?

हिंदी में संधि का शाब्दिक अर्थ होता है “मेल/जोड़ना” -दो या दो से अधिक वर्ण जब आपस मे मिलते है और एक नये शब्द का निर्माण करते है तो इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को ही संधि कहा जाता है।

संधि किसे कहते हैं?

संधि किसे कहते हैं?
संधि किसे कहते हैं?।संधि की परिभाषा।संधि का शाब्दिक अर्थ

संधि की परिभाषा—- दो समीपवर्ती वर्णों के मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है,वह संधि कहलाता है | संधि में पहलेे शब्द के अंतिम वर्ण एवं दूसरेे शब्द के आदि वर्ण का मेल होता है।

अथवा – प्रथम पद के अंतिम वर्ण तथा द्वितीय पद के प्रथम वर्ण को आपस में जोड़ कर नए वर्ण का बनाने तथा उस नये वर्ण को दोनों पदों के बीच में रखकर फिर उन्हें जोड़कर एक नया पद बनाने की प्रक्रिया संधि कहलाता है

उदाहरण — देव+आलय=देवालय
विद्या +आलय = विद्यालय
जगत + नाथ = जगन्नाथ

 इसमें देव और विद्या की अन्तिम ध्वनि अ व आ और आलय की आदि ध्वनि आ का उच्चारण यदि एक ही स्वर में किया जाये तो इस प्रकार दोनों मिलकर एक नया शब्द का निर्माण करते है जो देवालय और विद्यालय है।  दोनों ध्वनियाँ प्रबाहवित होकर मात्र आ हो जाती हैं। अतः इसे ही सन्धि कहेंगे।

संधि-विच्छेद किसे कहते हैं

संधि -विच्छेद— संधि के नियमों द्वारा मिले वर्णों को फिर मूल अवस्था में ले आने को संधि- विच्छेद कहते हैं। अर्थात संधि के किये हुए शब्द को पुनः अलग करने की प्रक्रिया संधि विच्छेद कहलाता है

उदाहरण — परीक्षार्थी =परीक्षा+अर्थी
वागीश=वाक+ईश
अंतःकरण=अंतः+करण

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संधि के कितने भेद होते हैं ?

वर्ण के आधार पर संधि के तीन भेद किए जाते हैं-

  1. स्वर संधि
  2. व्यजंन संधि
  3. विसर्ग संधि

संधि का पहला वर्ण यदि स्वर वर्ण हो तो ‘ स्वर संधि'(जैसे-नव+आगत=नवागत; संधि का पहला वर्ण ‘व’ – अ स्वरवाला है), संधि का पहला वर्ण यदि व्यंजन वर्ण हो तो ‘व्यजंन संधि ‘ (जैसे-वाक् + ईश=वागीश, संधि का पहला वर्ण क् व्यंजन वर्ण है) एवं संधि का पहला वर्ण यदि विसर्गयुक्त हो तो ‘विसर्ग संधि’ (जैसे- मनः+रथ=मनोरथ, संधि का पहला वर्ण ‘नः’ विसर्ग युक्त है) होता है।

स्वर संधि किसे कहते हैं?

स्वर के बाद स्वर आये अर्थात दो स्वरों के मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है स्वर संधि कहलाता है।

(अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ – ये सारे वर्ण, स्वर वर्ण के अंतर्गत आते हैं।)

उदाहरण-
सूर्य +अस्त=सूर्यास्त (अ+अ=आ)
महा+आत्मा=महात्मा (आ+आ=आ)
नर+इंद्र=नरेंद्र (अ+इ=ए)
एक+एक=एकैक (अ+ए=ऐ)
अति+अधिक=अत्यधिक (इ+अ=य)

स्वर संधि के भेद/प्रकार

स्वर संधि के निम्नलिखित पांच प्रकार होते हैं-

  1. दीर्घ-संधि
  2. गुण-संधि
  3. वृद्धि-संधि
  4. यण-संधि
  5. अयादि-संधि

note- आ, ई, ऊ को दीर्घ, अ, ए ,ओ को गुण, ऐ औ को वृद्धि,य,र,ल,व को यण एवं अय, आय,अव, आव को अयादि (अय+आदि)

1-दीर्घ संधि किसे कहते है?

ह्रस्व या दीर्घ ‘अ’, ‘इ’, ‘उ’ के पश्चात क्रमशः ह्रस्व या दीर्घ ‘अ’, ‘इ’, ‘उ’ स्वर आएं तो दोनों को मिलाकर दीर्घ ‘आ’, ,ई’, ‘ऊ’ हो जाते है। उदाहरण:-

(क) अ + अ = आ
धर्म+अर्थ=धर्माथ
स्व+अर्थी=स्वार्थी
देव+अर्चन=देवार्चन
(ख) अ+आ=आ
देव+आलय=देवालय
नव+आगत=नवागत
सत्य+आग्रह=सत्याग्रह
(ग) आ+अ=आ
परीक्षा+अर्थी=परीक्षार्थी
सीमा+अंत=सीमांत
दिशा+अंतर=दिशांतर
(घ) आ+आ=आ
महा+आत्मा=महात्मा
विद्या+आलय=विद्यालय
वार्ता+आलाप=वार्तालाप
(ङ) इ+इ=ई
अति+इव=अतीव
कवि+इंद्र=कवींद्र
मुनि+इंद्र=मुनींद्र
(च) इ+ई=ई
गिरि+ईश=गिरीश
परि+ईक्षा=परीक्षा
हरि+ईश=हरीश
(छ) ई+इ=ई
मही+इंद्र=महीन्द्र
योगी+इंद्र=योगीन्द्र
शची+इंद्र=शचीन्द्र
(ज) ई+ई=ई
रजनी+ईश=रजनीश
योगी+ईश्वर=योगीश्वर
जानकी+ईश=जानकीश
(झ) उ+उ=ऊ
भानु+उदय=भानूदय
विधु+उदय=विधूदय
गुरु+उपदेश=गुरुपदेश
(ञ) उ+ऊ=ऊ
लघु+ऊर्मि=लघूर्मी
धातु+ऊष्मा=धातूष्मा
साधु+ऊर्जा=साधूर्जा
(ट) ऊ+उ=ऊ
वधू+उपकार=वधूपकार
वधू+उत्सव=वधूत्सव
भू+उत्सर्ग=भूत्सर्ग
(ठ) ऊ+ऊ=ऊ
सरजू+ऊर्मि=सरयूर्मी
भू+ऊष्मा=भूष्मा
वधू+ऊर्मि=वधूर्मी

2-गुण-संधि किसे कहते है

गुण-संधि–गुण संधि-यदि ‘अ’और ‘आ’ के बाद ‘इ’ या ‘ई’, ‘उ’या ‘ऊ’ और ‘ऋ’ स्वर आए तो दोनों के मिलने से क्रमशः ‘ए’, ‘ओ’और ‘अर्’ हो जाते है। जैसे

(क) अ+इ=ए
नर+इंद्र=नरेंद्र
सुर+इंद्र=सुरेंद्र
पुष्प+इंद्र=पुष्पेंद्र
(ख) अ+ई=ए
नर+ईश=नरेश
परम+ईश्वर=परमेश्वर
सोम+ईश=सोमेश
(ग) आ+इ=ए
रमा+इंद्र=रामेंद्र
महा+इंद्र=महेंद्र
यथा+इष्ट=यथेष्ट
(घ) आ+ई=ए
महा+ईश=महेश
उमा+ईश=उमेश
राका+ईश=राकेश
(ङ) अ+उ=ओ
वीर+उचित=वीरोचित
मानव+उचित=मानवोचित
पर+उपकार=परोपकार
(च) अ+ऊ=ओ
सूर्य+ऊर्जा=सूर्योर्जा
नव+उढ़ा=नवोढ़ा
जल+ऊर्मि=जलोर्मि
(छ) आ+उ=ओ
महा+उदय=महोदय
महा+उत्सव=महोत्सव
महा+उदधि=महोदधि
(ज) आ+ऊ=ओ
दया+ऊर्मि=दयोर्मि
महा+ऊर्जा=महोर्जा
महा+ऊर्मि=महोर्मि
(झ) अ+ऋ=अर्
देव+ऋषि=देवर्षि
सप्त+ऋषि=सप्तर्षि
राज+ऋषि=राजर्षि

(ञ) आ+ऋ=अर्
महा+ऋषि=महर्षि

3-वृद्धि-संधि किसे कहते है?

वृद्धि-संधि— ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘ए’ या ‘ऐ’ आए तो दोनों के मेल से ‘ऐ’ हो जाता है तथा ‘अ’ और ‘आ’ के पश्चात ‘ओ’ या ‘औ’ आए तो दोनों से ‘औ’ हो जाता है। जैसे–

(क) अ+ए=ऐ
एक+एक=एकैक
लीक+एषणा=लोकैषणा
(ख) अ+ऐ=ऐ
मत+ऐक्य=मतैक्य
धन+ऐश्वर्य=धनैश्वर्य
(ग) आ+ए=ऐ
सदा+एव=सदैव
तथा+एव=तथैव
(घ) आ+ऐ=ऐ
महा+ऐश्वर्य=महैश्वर्य
रमा+ऐश्वर्य=रमैश्वर्य
(ङ) अ+ओ=औ
वन+ओषधि=वनौषधि
दंत+ओष्ठ=दंतैष्ठ
(च) अ+औ=औ
परम+औदार्य=परमौदार्य
परम+औषध=परमौषध
(छ) आ+ओ=औ
महा+ओजस्वी=महौजस्वी
महा+ओज=महौज
(ज) आ+औ=औ
महा+औषध=महौषध
महा+औदार्य=महौदर्य

4-यण-संधि किसे कहते है?

यण संधि–यदि ‘इ’, ‘ई’, ‘उ’, ‘ऊ’ और ‘ऋ’ के बाद भिन्न स्वर आए तो ‘इ’ और ‘ई’ का ‘य’, ‘उ’ और ‘ऊ’ का ‘व’ तथा ‘ऋ’ का ‘र्’ हो जाता है। जैसे—

(क) इ+अ=य
अति+अधिक=अत्यधिक
यदि+अपि=यद्यपि
इ+आ=या
इति+आदि=इत्यादि
अति+आचार=अत्याचार
इ+उ=यु
उपरि+उक्त=उपर्युक्त
अति+उत्तम=अत्युत्तम
इ+ऊ=यू
नि+ऊन=न्यून
वि+ऊह=व्यूह
इ+ए=ये
प्रति+एक=प्रत्येक
ई+आ=या
देवी+आगमन=देव्यागमन
ई+ऐ=यै
सखी+ऐश्वर्य=सख्यैश्वर्य

(ख) उ+अ=व
सु+अच्छ=स्वच्छ
अनु+इत=अन्वित
उ+आ=वा
सु+आगत=स्वागत
उ+इ=वि
अनु+इति=अन्विति
उ+ए=वे
अनु+एषण=अन्वेषण
उ+ओ=वो
गुरु+ओदन=गुर्वोदन
ऊ+आ=वा
वधू+आगमन=वध्वगमन

(ग) ऋ+अ=र
पितृ+अनुमति=पित्रनुमति
ऋ+आ=रा
मातृ+आज्ञा=मात्रज्ञा
पितृ+आज्ञा=पित्राज्ञा
ऋ+इ=रि
मातृ+इच्छा=मात्रिच्छ
पितृ+इच्छा=पित्रिच्छा

5-अयादि-संधि किसे कहते हैं?

अयादि-संधि– यदि ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’, ‘औ’ स्वरों का मेल दूसरे स्वरों से हो तो ‘ए’ का ‘अय’, ‘ऐ’ का ‘आय’, ‘ओ’ का ‘अव’ तथा ‘औ’ का ‘आव’ के रुप मे परिवर्तन हो जाता है। जैसे-

ए+अ=अय
ने+अन=नयन
शे+अन=शयन
ऐ+अ=आय
नै+अक=नायक
गै+अक=गायक
ऐ+इ=आयि
नै+इका=नायिका

ओ+अ=अव
पो+अन=पवन
भो+अन=भवन
ओ+इ=अवि
पो+इत्र=पवित्र

ओ+ई=अवी
गो+ईश=गवीश
औ+अ=आव
पौ+अन=पावन
भौ+अन=भावक
औ+इ=आवि
नौ+इक=नाविक
औ+उ=आवु
भौ+उक=भावुकप

व्यजंन-संधि किसे कहते है?

व्यजंन-संधि–व्यंजन के बाद स्वर या व्यंजन आने से जो परिवर्तन होता है उसे व्यंजन संधि कहते हैं ।
दूसरे शब्दों में,
संधि करते समय यदि शब्द के अंतिम वर्ण यदि व्यंजन हो और दूसरे शब्द का प्रथम वर्ण स्वर या व्यंजन हो तो इससे जो बदलाव होते हैं उसे व्यंजन संधि कहते हैं।

उदाहरण के लिए-
दिक् + गज = दिग्गज
अच्+अंत=अजन्त

Note–व्यजंन का शुद्ध रूप हल् वाला रूप (जैसे-क्,ख्,ग्…)होता है।

व्यजंन-संधि के नियम

व्यजंन-संधि के नियम निम्नलिखित है-

1- वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन:- किसी वर्ग के पहले वर्ण(क्,च्,ट्,त्,प्) का मेल किसी स्वर अथवा किसी वर्ग के तीसरे वर्ण (ग,ज,ड,द,ब) या चौथे वर्ण (घ, झ,ढ, ध,भ) अथवा अंतः स्थ व्यजंन (य,र,ल,व) के किसी वर्ण से होने पर वर्ग का पहला वर्ण अपने ही वर्ग के तीसरे वर्ण (ग्,ज्,ड्,द्,ब्) में परिवर्तित हो जाता है| जैसे–

क् का ग् होना
दिक्+गज=दिग्गज
वाक्+ईश=वागीश
च् का ज् होना
अच्+अंत=अजन्त
अच्+आदि=अजादि
ट् का ड् होना
षट्+आनन=षडानन
षट्+रिपु=षडिपु
त् का द् होना
भगवत्+भजन=भगवदभजन
उत्+योग=उद्योग
प् का ब् होना
अप्+ज=अब्ज
अप्+धि=अब्धि

2-वर्ग के पहले वर्ण का पाँचवे वर्ण में परिवर्तन:- यदि किसी वर्ग का पहला वर्ण (क्,च्,ट्,त्,प्) का मेल किसी अनुनासिक वर्ण ( वस्तुतः केवल न म )से हो तो उसके स्थान पर उसी वर्ग का पाँचवाँ वर्ण (ङ् , ञ् , ण , न् , म्) हो जाता हैं।जैसे-

क् का ङ् होना
वाक्+मय=वाड्मय
ट् का ण होना
षट्+मुख=षण्मुख

त् का न् होना
उत्+मत्त=उन्मत्त
तत्+मय=तन्मय
जगत् + नाथ = जगन्नाथ

3 -छ संबंधी नियम-
किसी भी ह्रस्व स्वर या ‘आ’का मेल ‘छ’ से पहले च् जोड़ दिया जाता है ।जैसे–

स्व+छंद =स्वच्छंद
परि+छेद=परिच्छेद
अनु+छेद=अनुच्छे

4-त् संबंधी नियम-

( i) -‘त्’ के बाद यदि ‘च,’छ’ हो तो ‘त्’ का ‘च’ हो जाता है।जैसे–

उत्+चारण=उच्चारण
जगत्+छाया=जगच्छाया
सत्+चरित्र=सच्चरित्र

( ii )-त्’ के बाद यदि ‘ज’,’झ’ हो तो ‘त्’ ज् में बदल जाता है।जैसे-

सत्+जन=सज्जन
जगत्+जननी=जगज्जननी
उत्+ज्वल=उज्ज्वल

(iii)- त्’ के बाद यदि ‘ट’, ‘ड’ हो तो त्, क्रमशः ‘ट्’, ‘ड्’ में बदल जाता है।जैसे-

बृहत्+टीका=बृहट्टीका
उत्+डयन=उड्डयन

(iv)- ‘त्’ के बाद यदि ‘ल’ हो तो ‘त्’, ‘ल’ में बदल जाता है; जैसे—

उत् +लास=उल्लास
तत् +लीन=तल्लीन

(v) ‘त्’ के बाद यदि ‘श्’ हो तो ‘त्’ का ‘च्’ और ‘श्’ का ‘छ्’ हो जाता है; जैसे—

उत् +श्वास=उच्छ्वास
सत्+शास्त्र = सच्छास्त्र

(vi) ‘त्’ के बाद यदि ‘ह’ हो तो ‘त्’ के स्थान पर ‘द्’ और ‘ह’ के स्थान पर ‘ध’ हो जाता है; जैसे

तत् +हित = तद्धित
उत्+ हार =उद्धार
उत् +हत= उद्धत

(5)- ‘न’ संबंधी नियम यदि -‘ऋ’, ‘र’, ‘ष’ के बाद ‘न’
व्यंजन आता है तो ‘न’ का ‘ण’ हो जाता है; जैसे-

परि +नाम=परिणम
प्र+मान=प्रमाण
राम+अयन=रामायण

6. ‘म’ संबंधी नियम :-

(i) –‘म्’ का मेल ‘क’ से ‘म’ तक के किसी भी व्यंजन वर्ग से होने पर ‘म्’ उसी वर्ग के पंचमाक्षर (अनुस्वार) में बदल जाता है जैसे-

सम्+कलन=संकलन
सम्+गति= संगति
परम्+तु=परन्तु

(ii) –‘म्’ का मेल यदि ‘य’, ‘र’, ‘ल’, ‘व’, ‘श’, ‘ष’, ‘स’,
‘ह’ से हो तो ‘म्’ सदैव अनुस्वार ही होता है जैसे-

सम्+योग=संयोग
सम् +रक्षक= संरक्षक
सम्+लाप= संलाप –
सम्+विधान= संविधान

(iii)- ‘म्’ के बाद ‘म’ आने पर कोई परिवर्तन नहीं होता है;जैसे-

सम्+मान= सम्मान
सम्+मति=सम्मति

विशेष : आजकल सुविधा के लिए पंचमाक्षर के स्थान पर
प्रायः अनुस्वार का ही प्रयोग होता है ।

7- ‘स’ संबंधी नियम- ‘स’ से पहले ‘अ’, ‘आ’ से भिन्न स्वर हो तो ‘स’ का ‘ष’ हो जाता है; जैसे-

वि+सम=विषम
वि+साद=विषाद
सु+समा=सुषम

विसर्ग-संधि किसे कहते हैं?

विसर्ग संधि :- विसर्ग के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो विकार होता है, उसे विसर्ग-संधि कहते हैं। जैसे-

निः+आहार=निराहार
दुः+आशा =दुराशा
तपः+भूमि=तपोभूमि
मनः+योग= मनोयोग

विसर्ग संधि के प्रमुख नियम

1. विसर्ग का ‘ओ’ हो जाता है : – यदि विसर्ग के पहले ‘अ’ और बाद में ‘अ’ अथवा प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण अथवा ‘य’, ‘र’, ‘ल’, ‘व’, ‘ह’ हो तो विसर्ग का ‘ओ’ हो जाता है; जैसे-

मनः + अनुकूल मनोनुकूल
अधः+गति=अधोगति
तपः+ बलतपोबल
वयः+ वृद्ध= वयोवृद्ध

अपवाद: –पुनः एवं अंतः में विसर्ग का र् हो जाता है; जैसे पुनः + मुद्रण= पुनर्मुद्रण
पुनः + जन्म=पुनर्जन्म
अंतः + धान अंतर्धान
अंतः + अग्नि= अंतरग्नि

2. विसर्ग का ‘र’ हो जाता है-
यदि विसर्ग के पहले ‘अ’, ‘आ’ को छोड़ कर कोई दूसरा स्वर हो और बाद में ‘आ’, ‘उ’, ‘ऊ’ या तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण या ‘य’, ‘र’, ‘ल’, ‘व’ में से कोई हो तो विसर्ग का ‘र’ हो जाता है; जैसे-

निः+आशा=निराशा
दुः+बल=दुर्बल

3. विसर्ग का ‘श’ हो जाता है :-
यदि विसर्ग के पहले कोई स्वर हो और बाद में ‘च’, ‘छ’ या ‘श’ हो तो विसर्ग का ‘श्’ हो जाता है; जैसे-

निः +चिंत= निश्चित
निः +छल =निश्छल
दुः +शासन= दुश्शासन

4. विसर्ग का ‘प्’ हो जाता है : –
विसर्ग के पहले ‘इ’, ‘उ’ और बाद में ‘क’, ‘ख’, ‘ट’, ‘ठ’, ‘प’, ‘फ’ में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग का ‘ष्’ हो जाता है; जैस-

निः+ कपट =निष्कपट
निः + कटक =निष्कंटक
निः+ ठुर= निष्ठुर
धनुः +टंकार=धनुष्टंकार

अपवाद-दुः+ख=दुःख

5. विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है : –
विसर्ग के बाद यदि ‘त’ या ‘थ’ हो तो विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है; जैसे—

नमः+ते=नमस्ते
निः+तेज=निस्तेज
मनः+ताप=मनस्ताप

6. विसर्ग का लोप हो जाना :-

(i) यदि विसर्ग के बाद ‘छ’ हो तो विसर्ग लुप्त हो जाता है और ‘च’ का आगम हो जाता है; जैसे-
अनुः छेद = अनुच्छेद
छत्रः +छाया=छत्रच्छाया

निः + संताप निस्संताप
मनः + ताप = मनस्ताप

(ii) यदि विसर्ग के बाद ‘र’ हो तो विसर्ग लुप्त हो जाता है और उस के पहले का स्वर दीर्घ हो जाता है; जैसे

निः +रोग =नीरोग
निः +रस =नीरस

7. विसर्ग में परिवर्तन न होना : –
यदि विसर्ग के पूर्व ‘अ’ हो तथा बाद में ‘क’ या ‘प’ हो तो विसर्ग में परिवर्तन नहीं होता है। जैसे-

प्रातः + काल = प्रातः काल
अंतः+करण=अंतःकरण
अंतः + पुर = अंतःपुर
अधः + पतन = अधःपतन

अपवादः -नमः एवं पुरः में विसर्ग का स् हो जाता है; जैसे नमः + कार= नमस्कार
पुरः+कार=पुरस्कार

हिन्दी की कुछ विशेष संधियाँ-

संस्कृत की संधियों के अतिरिक्त हिंदी की कुछ विशेष संधियाँ हैं । इनके नियम अभी तक स्पष्ट नहीं हैं तथापि कुछ का परिचय निम्नलिखित है-

1. ‘आ’ का ‘अ’ हो जाना

आम+चूर= अमचूर
हाथ + कड़ी= हथकड़ी
राज+ लड़का = रजवाड़ा
कान + कटा = कनकटा

2- ‘इ’, ‘ई’ के स्थान पर ‘इय्’ हो जाता है

शक्ति + आँ= शक्तियाँ
देवी + आँ =देवियाँ


3. ‘ई’, ‘ऊ’ का क्रम से ‘इ’, ‘उ’ हो जाना

नदी + आँ= नदियाँ
वधू+एँ =वधुएँ



4-‘ह’ का ‘भ’

‘जब’, ‘तब’, ‘कब’, ‘सब’, ‘अब’ आदि शब्दों के पीछे ‘ही’ आने पर ‘ही’ के ‘ह’ का ‘भ’ हो जाता है; जैसे-

जब +ही = जभी
कब +ही = कभी
तब+ही=तभी
सब + ही= सभी

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संधि के FAQ questions

दो वर्णो के मेल से होनेवाले विकार को क्या कहते है?

संधि कहते है।

संधि कितने प्रकार के होते है?

मुख्यतः तीन प्रकार के

सदैव में कौन सी संधि है?

स्वर संधि

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